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Showing posts from 2020

आपके वास्ते मन मे ढेरों शुभकामनाएं लाए हैं।😊

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आपके वास्ते मन मे ढेरों शुभकामनाएं लाए हैं। . सुख की कल्पनाएं है, सृजनात्मक गीत लाए हैं आपके वास्ते मन में ढेरों शुभकामनाएं हैं आपकी जिंदगी में न घटे कोई पल ऐसा, उदासी में जो पल तुमने पिछले दिनों बिताए हैं हर नई सुबह, हर नया हफ़्ता, हर नया महीना और हर नया साल खुद में नई ऊर्जा, नई उम्मीदों व नई आकांक्षाओं को समेटे हुए गुजरे वक्त के तनावों व अवसादों से मुक्त होकर एक नई उम्मीद व अवसर की शुरूआत लेकर आता है, लेकिन मैं साल 2020। मेरी शुरूआत ही कोराना नामक महामारी से हुई। इंसानी इतिहास का सबसे मुश्किल दौर में शुरू हुआ और मेरे खत्म होने तक भी बाकी है। मेरे कारण ही आपको लॉकडाउन ने घरों में कैद किया। आर्थिक, शारीरिक, स्‍वास्‍थ्‍य आदि चुनौतियों का भी सामना किया। मानता हूं कि मेरे दौर में आई इस बीमारी ने कइयों को संभलने का मौका भी नहीं दिया। कई लोग बेधर हुए तो कइयों के रोजगार गए। कइयों की जान भी गई, आपने यह भी कहा कि ऐसा साल दोबारा न आए। मनहूस साल व अन्य कई बुरे नामों से मुझे पुकारा गया लेकिन क्या वाकई मैं सिर्फ बुराई लेकर आया। चूंकि हर दुखद पहलू के पीछे सुखद पहलू भी छिपा ह...
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                                         चाय न होती तो कैसा होता जीवन.... सोचता हूं कभी-कभी ये चाय न होती तो कैसा होता जीवन चाय की दो चुस्कियों के बिना अधूरा सा लगता है जीवन ये दो चुस्‍की के बिना नीरस होता जीवन का परमानंद ।।     ये चुस्‍की न होती तो क्‍या बन पाते नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री ? ये चुस्‍की न होती तो क्‍या हो पाती गली-2 चाय पर चर्चा ? ये चुस्‍की न होती तो क्‍या हो पाते राजनैतिक हित पूरे ? ये चुस्‍की न होती तो क्‍या रिश्‍ते बन पाते     चुस्‍की है तो कट जाता है दिन ठहर जाती हैं शामें ये चाय की चुस्‍की है तो रंगीन हो जाती है सुबह , चुस्‍की है तो मना लिए जाते हैं रूठे भी बन जाते हैं टूटे हुए रिश्‍ते भी ।।     दिन में जब भी आलस्‍य आये तो याद आती हैं दो चुस्कियां । भागदौड़ भरी जिदंगी में जीवन का रास्‍ता है दो चुस्कियां । तन्‍हा हो या महफिल में हमेशा साथ निभाती हैं यह दो चुस्कियां । साधु हो या भोगी सभी के जीवन का हिस्‍सा है यह च...
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  आजाद भारत ने न कभी ऐसा देखा न सुना....      इस बार आजादी की 74वीं शाम उतनी खुशहाली भरकर नहीं लाई। लालकिले की प्राचीन से विश्‍व के सबसे मजबूत लोकतंत्र के प्रधानमंत्री के संबोधन में भी ऐसा कुछ खास नहीं था जो जनता को सीधे राहत देने वाला हो। कोरोना के साये में मना आजादी का यह जश्‍न फीका ही रहा और स्‍मरीय भी। आजाद भारत में इस वर्ष वह सब हुआ और वह सब लोगों ने देखा जो पहले कभी न ही देखा और न सुना। गत वर्ष हजारों रोजगार थे तो इस वर्ष लाखों बेरोजगार हैं। 24 मार्च को कोराना की लड़ाई को 21 दिन में जीतने का प्रण लेने वाले अब खामोश हैं , केंद्र सरकार ने हाथ खड़े कर लिए हैं वहीं राज्‍य सरकारें कोरोना के खिलाफ लड़ाई में बेबस दिखाई दे रही हैं। रविवार देर रात नौ बजे तक देश में संक्रमितों की संख्या बढ़कर 2589682 हो चुकी है। देश में अभी कोरोना के 677444 एक्टिव केस हैं जबकि इलाज के बाद 1862258 को अस्पतालों से डिस्चार्ज किया जा चुका है। जानलेवा वायरस की चपेट में आने से अब तक 49980 कोरोना मरीज जान गंवा चुके हैं. भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के अनुसार 15 अगस्त ...

पिता की ममता

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                                                                        पिता की ममता मां की ममता दुनिया की सबसे बड़ी अनुभूति है, सच भी है कि मां की समान कोई भी नहीं होता। मानसिक संवेदनाएं मां से अधिक अन्य किसी को स्वीकार नहीं करती। लेकिन मां के वात्सल्य का सबसे बड़ा पूरक पिता ही है। वह अपनी ममता को हदय में दबाए सबकुछ न्योछावर करने के लिए अपना पूरा जीवन लगा देता है। पिता अपनी संतान के लिए भी हर क्षण मरता है। यह इस संसार की विडंबना ही कही जाएगी कि मां की ममता तो सबको दिखती है, लेकिन पिता की ममता को स्पर्श नहीं कर पातो। पिता के कठोर व्यवहार में ममता कासागर नहीं खोज पाते। सोचिए जरा दिमाग पर जोर देकर कि यह संसार एक पिता पर कितना बड़ा अन्याय करता है।  मां के पास सभी जाना चाहते हैं, लेकिन पिता के पास उनके मन की गहराइयों तक कोई नहीं पहुंचना चाहता। पिता की ममता ही है जो प्रेम के अथाह समुद्र मे...

इंतजार--फिर से ढले वही शाम, फिर से निकले वही सूरज

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फिर से निकले वही सूरज, फिर से ढले वही शाम - रोशनलाल की जलेबी व देवा की कचौड़ी का है इंतजार... - लॉकडाउन खुले तो मिले कुछ हद तक बंदिशों से राहत  कासगंज। वह सुबह जो नदरई गेट पर रोशनलाल की जलेबी व गांधी मूर्ति पर देवा व जैन की कचौड़ी से शुरू होती थी। शाम गांधी मूर्ति के पास गोल गप्पे, भेलपुरी व अन्य चाटकर के साथ ढलती थी। उस पर कोरोना काल की ऐसी नजर लगी कि उसने २४ मार्च की रात से इन सभी की कढ़ाई उतरवा दी। रविवार को कोरोना काल को एक माह तीन दिन हो गए। अब लॉकडाउन के दूसरे चरण के निर्धारित समय में भी सिर्फ सात दिन का समय शेष है। लोगों को उम्मीद है कि शायद उन्हें आने वाले समय में इस कोरोना काल में कुछ  राहत जरूर मिलेगी। यदि लॉकडाउन बढ़ेगा भी तो सरकार ठप्प पड़े व्यापारिक पहिए को चलाने को कुछ सकारात्मक कोशिश जरूर दिखाएगी। हांलाकि सबकुछ पहले की तरह तो इतनी जल्दी सामान्य नहीं होने वाला लेकिन फिर भी कहावत है न कि उम्मीद पर दुनिया कायम है।  इस एक माह तीन दिन के समय में लोगों ने जो संयम का परिचय दिया वह भी काबिले तारीफ है। इस पर भी गौर करना होगा कि जनपद के पड़ोसी जिले अलीगढ़...

मन जब तमाम आशंकाओं से घिरा हो तो घर का रास्ता ही दिखता है.....।

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मन जब तमाम आशंकाओं से घिरा हो तो घर का रास्ता ही दिखता है.....।                 चाय विस्कीट के सहारे कट रहे दिन। कासगंज। मन जब तमाम आंशकाओं से घिरा हो तो शांति के लिए सिर्फ घर का ही रास्ता दिखता है, क्योंकि वहां उसे अपनों के बीच खाने-पीने और रहने का डर नहीं है। कोरोना काल में मजदूरों के मन में भविष्य की तमाम आंशकाओं के कारण वह एक माह के बाद भी पलायन को मजबूर है। केंद्र व राज्य सरकार के सुविधाओं के तमाम दावे भी इन मजदूरों के कदम नहीं रोक पा रहे।शनिवार को नदरई गेट पर पुलिस ने गुजरात से आए तीन मजदूरों को रोका और उनकी मेडीकल जांच कराई। यह मजदूर १२00किलोमीटर का सफर तय कर आए थे और अभी उन्हें २०० किलोमीटर का सफर और तय करना था। शुक्रवार को भी आधा दर्जन मजदूर रेलवे पटरी के किनारे पुलिस ने रोके थे। यह मजदूर पानी व बिस्किट के सहारे ही हजारो किलोमीटर का सफर तय कर रहे हैं।   शनिवार को तड़के सुबह वीरपाल, अजयपाल, विजेंद्र निवासी नीमापुर हरदोई को नदरई गेट पुलिस चौकी द्वारा पूछताछ के लिए रोका गया। भूख व थकान की बेबसी उनके चेहरे पर देख पुलिस न...
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जब हथियार नहीं तो रास्ते और भी हैं.... समूचा विश्व आज कोरोना वायरस के अभूर्तपूर्व संकट से गुजर रहा है। विपदा ऐसी है कि शक्तिशाली से लेकर आम जनमानस भी इस अदृश्य असुर की शक्ति से नहीं बच पा रहा है, यह असुर पूरे विश्व को निगलने को आतुर है। फिलहाल तो इस असुर का खात्मा भी नहीं किया जा सकता है। सवाल है कि फिर इस असुरी शक्ति से कैसे पार पाया जाए। इसकी राह हमारे धर्मग्रंथों ने हमें दिखाई है। श्रीमदृभागवत में एक प्रसंग है कि मगध नरेश जरासंघ ने 18वीं बार अपने साथ एक अज्ञात योद्वा कालयवन को लेकर चढ़ाई कर दी।युद्व के दौरान जब भगवान श्रीकृष्ण को यह ज्ञात हुआ कि इस योद्वा को अस्त्र- शस्त्र से नहीं हरा सकते तो वह एक विशेष दिशा की ओर भागे। कालयवन भी उनके पीछे दौड़ा। भागते हुए श्रीकृष्ण एक गुफा में घुस गए। गुफा में पहले से सोते हुए व्यक्ति पर उन्होंने अपना पीतांबर डाल दिया। कालयवन ने उसे श्रीकृष्ण समझकर उनके ऊपर प्रहार किया। सोते हुए व्यक्ति की निद्रा टूटी और कालयवन भी श्राप के कारण भस्म हो गया। उक्त घटना को यदि वर्तमान परिपेक्ष्य में शामिल करें तो यहीं संदेश है कि कोरोना नामक इस महामारी के सामने...

सिर्फ बड़ा आर्थिक सुधार ही उबार सकेगा कोरोना के बाद

सिर्फ बड़ा आर्थिक सुधार ही उबार सकेगा कोरोना के बाद काेविड-19 सिर पर तानी हुई बंदूक जैसा है, जिसके डर से हमारा बटुवा खाली हो रहा है चेतन भगत , अंग्रेजी के उपन्यासकार इस लेख को लिखते समय भारत में लॉकडाउन है। सड़कें खाली हैं और ट्रेनें व फ्लाइट नहीं चल रही हैं। स्कूल, ऑफिस और फैक्टरियां बंद हैं। हम एक ऐसी वैश्विक महामारी से जूझ रहे हैं, जिसे हराना दुनिया के सबसे अमीर और विकसित देशों के लिए भी मुश्किल हो रहा है। यह लॉकडाउन सही है। तेजी से फैलने वाले कोविड-19 कोरोना वायरस को चीन ने इसी तरह के लॉकडाउन की मदद से ही रोका। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि यूरोप और अमेरिका के भी बड़े हिस्से में वायरस को फैलने से राेकने के लिए इसी तरह के कदम उठाए जा रहे हों। लोग डरे हुए हैं। इस समय भावनाओं पर भय हावी हो रहा है। हम वायरस को नहीं रोक सकते। हमारे पास अब तक इसके लिए वैक्सीन नहीं है। यह अपने आप धीमा हो जाएगा, गर्म मौसम इस पर कुछ हद तक रोक लगा सकता है, कुछ दवाएं इसमें काम आ सकती हैं, कोई वैक्सीन ईजाद कर सकता है पर हममें से कोई नहीं जानता कि यह कब और कैसे होगा। इतनी अनिश्चितताओं के सामने मनुष्य की सामान...

चौतरफा आपदा और निपटने के तरीके

चौतरफा आपदा और निपटने के तरीके पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और सामाजिक विषयों पर एक के बाद एक संकट सामने आए हैं। ये इतने व्यापक हैं कि विभिन्न देशों और समुदायों की प्रतिक्रिया देने की क्षमता कम पड़ सकती है।  अरुणाभ घोष कोविड -19 की महामारी फैलने के पहले ही चालू वर्ष अनिश्चितता के साथ शुरू हुआ। ऑस्ट्रेलिया के वनों में लगी आग में 1,86,000 वर्ग किलोमीटर भूभाग जल चुका था। फरवरी में अंटार्कटिका का अधिकतम तापमान 18.3 डिग्री सेल्सियस हो गया जो जलवायु परिवर्तन में गिरावट का स्पष्ट संकेत है। जिंस कीमतों में गिरावट है, वैश्विक अर्थव्यवस्था में मांग की कमी बनी हुई है और तेल कीमतें भी काफी घट गई हैं। अब हालात और खराब हुए हैं। कोरोनावायरस का प्रकोप बढऩे के साथ ही शहर, देश और क्षेत्र तक पूरी तरह बंद कर दिए गए। रूस ने तेल उत्पादन में कटौती करने से इनकार कर दिया है। इसके कारण सऊदी अरब ने बाजार में और अधिक तेल की भरमार कर दी और कीमतें लुढ़क गईं। सीमाएं बंद होने और आपूर्ति शृंखला बाधित होने, वस्तुओं और सेवाओं के बाधित होने से लोगों की स्थिति और खराब होने की आशंका है। आर्थिक प्रभाव नजर आने लगा है...

कृषि नीतियां और विकास

कृषि नीतियां और विकास अकलेश आयुर्वेद इस साल रबी की लाखों एकड़ फसल बेमौसम बरसात के कारण बर्बाद हो गई। मार्च महीने में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, हरियाणा और दिल्ली में घनघोर आंधी-तूफान और ओले पड़े। इससे गेंहू, जौ, सरसों, अलसी, अरहर, मटर, आलू और सब्जियों की लाखों एकड़ जमीन में लहलहातीं फसलें जमीन पर लोटने या पानी में डूब कर सड़ने लगीं। उत्तर प्रदेश सरकार ने जिलाधिकारियों को जायजा लेने और उसके मुताबिक किसानों को राहत देने की बात कही है। कुदरत किसानों पर आए दिन कहर ढाती रहती है। केंद्र और राज्य सरकारें तुरंत राहत देकर मरहम लगाने की कोशिश करती हैं। यह एक रिवाज की तरह आजादी के बाद से निभाया जा रहा है। इससे किसानों को फौरी तौर पर कुछ राहत तो मिल जाती है, लेकिन उनकी मूल समस्याएं जस की तस बनी रहती हैं। आजादी के बाद से अब तक केंद्र में कोई ऐसी सरकार नहीं आई, जिसने खेती-किसानी को सबसे कठिन और अनिश्चित धंधे से निकाल कर सरल और निश्चित आय का बनाने के लिए कोई ठोस कदम उठाया हो। केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियों में किसानों को लालीपॉप थमाने के अलावा कोई ठोस नीति या योजना नहीं रही। इसलिए समस्य...
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देश की सेवा का समय आ गया है , तैयार हैं न आप .... क्‍या बार्डर पर जाकर जंग लड़ना ही देश सेवा है या मानव द्वारा मानवता की सेवा असल देश सेवा है , इस बात का जवाब स्‍वयं से जरूर पूछियेगा क्‍येांकि कोविड-19 वैश्विक महामारी के बीच जब हमको देश के प्रति समाज के प्रति कुछ करने का मौका मिला है तो हम अपनी जिम्‍मेदारियेां से भाग रहे हैं , आज भी कई लोग बिना कारण घर से निकल रहे हैं , पार्क में घूम रहे हैं और अपनी मनमानी जिदंगी बसर कर रहे हैं। माना कि आपको अपनी जिदंगी से मोह नहीं लेकिन भारत में कोविड-19 कोराना का प्रभाव यदि 10 प्रतिशत लोगों को भी हुआ तो इन 10 प्रतिशत लोगों की मनमानी शेष 90 प्रतिशत लोगों पर भी भारी पड़ सकती है। ऐसे में सरकार की सारी कवायदें घरी रह जाएंगी , आज जब जरूरत है समाज व देश के लिए कुछ करने की तो क्‍या हमारी जिम्‍मेदारी नहीं है , कि हम जागरुक हो और आसपास के लोगों को भी इस भयावह बीमारी के बारे में जागरूक करें। भारत में यह भी देखने को मिला कि कोरोना प्रभावित लोग अभी भी पार्टियां कर रहे हैं , ताजा मामला मशहूर गायिका कनिका कपूर का है , जिनमें कोरोना वायरस पॉजीटिव...
हिंदी हैं हम वतन हैं..... मेरी मातृभाषा में कितनी ही कमियां क्‍यों न हों , मैं उससे उसी तरीके से चिपका रहूंगा जैसे बच्‍चा अपनी मां से। यही मुझे जीवनदायनी दूध दे सकती है। यदि अंग्रेजी वह स्‍थान हड़पना चाहे जिसकी वह हकदार नहीं , तो मैं उससे सख्‍त नफरत करूंगा -   महात्‍मा गांधी विविधता से भरे भारत जैसे देश में हिंदी के लिए भारत के राष्‍ट्रपिता महात्‍मागांधी के यह विचार भी आज भी प्रासंगिक हैं , हिंदी की उपयोगिता पर हमने उतना ध्‍यान नहीं दिया जितना देना चाहिए था , आज भी देखने में आता है कि अंग्रेजी माध्‍यम से शिक्षा लेने वाला विद्यार्थी ग‍ित का अंक   सिस्‍टी नाइन- फिफ्टीनाइन तो सहजता से बोल सकता है , लेकिन हिंदी में उसे उन्‍नह्तर और उनसठ बोलने में कठिनाई महसूस होती है , ऐसा क्‍यों है इस पर हमें विचार की जरूरत है। भाषा की सहजता के लिए सिर्फ सरकारों का मुंह तांका जाए यह पूरी तरह जायज नहीं है , संस्‍कार युक्‍त समाज के लिए हमारी भी यह नैतिक जिम्‍मेदारी है कि रोजगार व व्‍यक्तित्‍व विकास के लिए अंग्रेजी के साथ हम हिंदी को भी उतनी ही प्राथमिकता दें।    जब दे...