पिता की ममता
मां की ममता दुनिया की सबसे बड़ी अनुभूति है, सच भी है कि मां की समान कोई भी नहीं होता। मानसिक संवेदनाएं मां से अधिक अन्य किसी को स्वीकार नहीं करती। लेकिन मां के वात्सल्य का सबसे बड़ा पूरक पिता ही है। वह अपनी ममता को हदय में दबाए सबकुछ न्योछावर करने के लिए अपना पूरा जीवन लगा देता है। पिता अपनी संतान के लिए भी हर क्षण मरता है। यह इस संसार की विडंबना ही कही जाएगी कि मां की ममता तो सबको दिखती है, लेकिन पिता की ममता को स्पर्श नहीं कर पातो। पिता के कठोर व्यवहार में ममता कासागर नहीं खोज पाते। सोचिए जरा दिमाग पर जोर देकर कि यह संसार एक पिता पर कितना बड़ा अन्याय करता है।
मां के पास सभी जाना चाहते हैं, लेकिन पिता के पास उनके मन की गहराइयों तक कोई नहीं पहुंचना चाहता। पिता की ममता ही है जो प्रेम के अथाह समुद्र में डूबकर दिन प्रतिदिन नवीन आकार ग्रहण करती है, मां तो हर रोज ममता में जीती है, लेकिन पिता न सिर्फ इस ममता में जीता है अपितु मरता भी है। मां की कहानी में सुखांत हैं और पिता की कहानी में दुखांत। जीवन के निर्माण में पिता का अहम योगदान निमित्त है, लेकिन संसार सिर्फ मां के वात्सल्य को ही देख पाता है। एक योगी की भांति पिता अपनी संतान पर धैयपूर्वक अपना जीवन तिल-तिल कर लुटाता है, वह भी बिना कुछ मांगे, बिना कुछ चाहे। अपने संतान की उन्नति के लिए जीवन रूपी यज्ञ में अपने सपनों, सुख की आहूति देता है। जीवन जीने की कला से लेकर जीवन के विज्ञान तक सभी पाठ सिखाता हुआ पिता अंत समय में भी पुत्र को ममता के मणि माणिक्य दे जाता है, लेकिन संसार का दुर्भाग्य देखिए कि वह मां के वात्सल्य को तो आदर देता है, लेकिन पिता के वात्सल्य को वह प्रेम नहीं दे पाता जिसका वह अधिकारी है।
दैनिक जागरण के ऊर्जा कॉलम से, डॉ. राधवेंद्र शुक्ल जी द्वारा रचित यह अंश जीवन में नई ऊर्जा व प्रेरणा का संचार करते हैं।
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