हिंदी हैं हम वतन हैं.....
मेरी
मातृभाषा में कितनी ही कमियां क्यों न हों, मैं उससे
उसी तरीके से चिपका रहूंगा जैसे बच्चा अपनी मां से। यही मुझे जीवनदायनी दूध दे
सकती है। यदि अंग्रेजी वह स्थान हड़पना चाहे जिसकी वह हकदार नहीं, तो मैं उससे सख्त नफरत करूंगा -
महात्मा गांधी
विविधता से भरे भारत जैसे
देश में हिंदी के लिए भारत के राष्ट्रपिता महात्मागांधी के यह विचार भी आज भी
प्रासंगिक हैं, हिंदी की उपयोगिता पर हमने उतना ध्यान
नहीं दिया जितना देना चाहिए था, आज भी देखने में आता है कि
अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा लेने वाला विद्यार्थी गित का अंक सिस्टी नाइन- फिफ्टीनाइन तो सहजता से बोल
सकता है, लेकिन हिंदी में उसे उन्नह्तर और उनसठ बोलने में
कठिनाई महसूस होती है, ऐसा क्यों है इस पर हमें विचार की
जरूरत है। भाषा की सहजता के लिए सिर्फ सरकारों का मुंह तांका जाए यह पूरी तरह जायज
नहीं है, संस्कार युक्त समाज के लिए हमारी भी यह नैतिक
जिम्मेदारी है कि रोजगार व व्यक्तित्व विकास के लिए अंग्रेजी के साथ हम हिंदी
को भी उतनी ही प्राथमिकता दें।
जब देश आजाद हुआ तक तक
अंग्रेजी का प्रभाव देश में बना हुआ था, देश में प्रशासनिक काम-काज का माध्यम
अंग्रेजी ही था, लेकिन देश में आजादी के आंदोलन के समय स्थानीय
लोगों के विचारों की आदान-प्रदान की भाषा हिंदी या स्थानीय भाषा ही थी। कलकत्ता
से पंडित जुगल किशोर ने हिंदी के प्रथम समाचार पत्र उदंत मार्तण्ड को प्रकाशित
कर हिंदी को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था,
लेकिन अंग्रेजी की दमन नीति के कारण यह हिंदी समाचार पत्र अधिक दिन संघर्ष नहीं कर
सका और इसके कुल 71 अंक ही प्रकाशित हो पाए और पंडित जुगल किशोर ने अपने अंतिम
अंक में आज दिवस लो उग चुक्यौ मार्तण्ड उदंत अस्ताचल को जात है दिनकर-दिन अब
अंत... का प्रकाशन कर इस पत्र को बंद कर दिया। तब से लेकर अब तक हिंदी के विकास
में कईयों ने योगदान दिया। हिंदी के समाचार पत्रों ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वर्तमान सरकार भी हिंदी के प्रचार-प्रसार पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रही है, भारत सरकार का गृह मंत्रालय भाषायी आधार पर राज्यों के गठन के साथ हिंदी
के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। नगर राजभाषा समिति व राजभाषा
कार्यान्वय समितियां भी हिंदी के प्रचार-प्रसार पर अधिक जोर दे रहीं हैं, लेकिन कर्मचारियों की प्रतिबद्वता के बिना केंद्रीय सरकारी
कार्यालयों में शत-प्रतिशत कार्य हिंदी
में होना अभी भी दूर की कौढ़ी सा प्रतीत हो रहा है, भारत के
बारे में यह कहावत कि यहां पर कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोष
पर बानी।
विविधताओं से भरे भारत में पूरे देश को मातृभाषा
के सूत्र में पिरौना कठिन है, लेकिन असंभव नहीं। भारतीय संविधान की आठवीं
अनुसूची में 22 भाषाओं को मान्यता दी गई है, संविधान ने भी
हिंदी को राजभाषा का दर्जा तो दे दिया है, लेकिन मातृभाषा का
दर्जा प्राप्त करने को हिंदी आज भी संघर्ष के दौर से गुजर रही है। विश्व के
विभिन्न बड़े सोशल मीडिया प्लेटफार्म फेसबुक, व्हाट्सएप, गुगल तक ने भारत में हिंदी के महत्व के कारण हिंदी पर अपना ध्यान देना
शुरू कर दिया है, भारत
में कार्यरत स्वदेशी व विदेशी कंपनी जिनकी वेबसाइट पर कुछ समय पूर्व तक सिर्फ अंग्रेजी में जानकारियां
उपलब्ध होती थीं वहां अब हिंदी में जानकारियां सहजता से उपलब्ध है। संविधान ने
हमें शक्ति दी है कि न्यायिक प्रक्रिया
को छोड़ दे अन्य कार्यालयों से हम हिंदी
में किए हुए पत्राचार का जवाब हिंदी में
ही पाने को संबंधित कार्यालय को बाध्य कर सकते हैं, यह
हिंदी के बढ़ती शक्ति का सूचक है, अब हम और आपको प्रयास करना
है कि हम अपना अधिक से अधिक कार्य हिंदी में करके हिंदी को मातृभाषा का दर्जा
दिलाने व हिंदी के प्रचार-प्रसार में अपना महत्वपूर्ण योगदान दें। आइये, हम संकल्प लें कि हम कार्यालयीन कार्य को अधिक से अधिक हिंदी भाषा में
करेंगे और अन्य लोगों को भी हिंदी में कार्य करने के लिए प्रेरित करेंगे।
हिंदी के महत्व के लिए भारतेंदु हरिशचंद्र जी की यह पंक्तियां आज भी
प्रासंगिक हैं...
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल ।
बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय को शूल ।
आकाशदीप
भारद्वाज
कार्यालय सहायक/राजभाषा
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