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Showing posts from March, 2020
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जब हथियार नहीं तो रास्ते और भी हैं.... समूचा विश्व आज कोरोना वायरस के अभूर्तपूर्व संकट से गुजर रहा है। विपदा ऐसी है कि शक्तिशाली से लेकर आम जनमानस भी इस अदृश्य असुर की शक्ति से नहीं बच पा रहा है, यह असुर पूरे विश्व को निगलने को आतुर है। फिलहाल तो इस असुर का खात्मा भी नहीं किया जा सकता है। सवाल है कि फिर इस असुरी शक्ति से कैसे पार पाया जाए। इसकी राह हमारे धर्मग्रंथों ने हमें दिखाई है। श्रीमदृभागवत में एक प्रसंग है कि मगध नरेश जरासंघ ने 18वीं बार अपने साथ एक अज्ञात योद्वा कालयवन को लेकर चढ़ाई कर दी।युद्व के दौरान जब भगवान श्रीकृष्ण को यह ज्ञात हुआ कि इस योद्वा को अस्त्र- शस्त्र से नहीं हरा सकते तो वह एक विशेष दिशा की ओर भागे। कालयवन भी उनके पीछे दौड़ा। भागते हुए श्रीकृष्ण एक गुफा में घुस गए। गुफा में पहले से सोते हुए व्यक्ति पर उन्होंने अपना पीतांबर डाल दिया। कालयवन ने उसे श्रीकृष्ण समझकर उनके ऊपर प्रहार किया। सोते हुए व्यक्ति की निद्रा टूटी और कालयवन भी श्राप के कारण भस्म हो गया। उक्त घटना को यदि वर्तमान परिपेक्ष्य में शामिल करें तो यहीं संदेश है कि कोरोना नामक इस महामारी के सामने...

सिर्फ बड़ा आर्थिक सुधार ही उबार सकेगा कोरोना के बाद

सिर्फ बड़ा आर्थिक सुधार ही उबार सकेगा कोरोना के बाद काेविड-19 सिर पर तानी हुई बंदूक जैसा है, जिसके डर से हमारा बटुवा खाली हो रहा है चेतन भगत , अंग्रेजी के उपन्यासकार इस लेख को लिखते समय भारत में लॉकडाउन है। सड़कें खाली हैं और ट्रेनें व फ्लाइट नहीं चल रही हैं। स्कूल, ऑफिस और फैक्टरियां बंद हैं। हम एक ऐसी वैश्विक महामारी से जूझ रहे हैं, जिसे हराना दुनिया के सबसे अमीर और विकसित देशों के लिए भी मुश्किल हो रहा है। यह लॉकडाउन सही है। तेजी से फैलने वाले कोविड-19 कोरोना वायरस को चीन ने इसी तरह के लॉकडाउन की मदद से ही रोका। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि यूरोप और अमेरिका के भी बड़े हिस्से में वायरस को फैलने से राेकने के लिए इसी तरह के कदम उठाए जा रहे हों। लोग डरे हुए हैं। इस समय भावनाओं पर भय हावी हो रहा है। हम वायरस को नहीं रोक सकते। हमारे पास अब तक इसके लिए वैक्सीन नहीं है। यह अपने आप धीमा हो जाएगा, गर्म मौसम इस पर कुछ हद तक रोक लगा सकता है, कुछ दवाएं इसमें काम आ सकती हैं, कोई वैक्सीन ईजाद कर सकता है पर हममें से कोई नहीं जानता कि यह कब और कैसे होगा। इतनी अनिश्चितताओं के सामने मनुष्य की सामान...

चौतरफा आपदा और निपटने के तरीके

चौतरफा आपदा और निपटने के तरीके पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और सामाजिक विषयों पर एक के बाद एक संकट सामने आए हैं। ये इतने व्यापक हैं कि विभिन्न देशों और समुदायों की प्रतिक्रिया देने की क्षमता कम पड़ सकती है।  अरुणाभ घोष कोविड -19 की महामारी फैलने के पहले ही चालू वर्ष अनिश्चितता के साथ शुरू हुआ। ऑस्ट्रेलिया के वनों में लगी आग में 1,86,000 वर्ग किलोमीटर भूभाग जल चुका था। फरवरी में अंटार्कटिका का अधिकतम तापमान 18.3 डिग्री सेल्सियस हो गया जो जलवायु परिवर्तन में गिरावट का स्पष्ट संकेत है। जिंस कीमतों में गिरावट है, वैश्विक अर्थव्यवस्था में मांग की कमी बनी हुई है और तेल कीमतें भी काफी घट गई हैं। अब हालात और खराब हुए हैं। कोरोनावायरस का प्रकोप बढऩे के साथ ही शहर, देश और क्षेत्र तक पूरी तरह बंद कर दिए गए। रूस ने तेल उत्पादन में कटौती करने से इनकार कर दिया है। इसके कारण सऊदी अरब ने बाजार में और अधिक तेल की भरमार कर दी और कीमतें लुढ़क गईं। सीमाएं बंद होने और आपूर्ति शृंखला बाधित होने, वस्तुओं और सेवाओं के बाधित होने से लोगों की स्थिति और खराब होने की आशंका है। आर्थिक प्रभाव नजर आने लगा है...

कृषि नीतियां और विकास

कृषि नीतियां और विकास अकलेश आयुर्वेद इस साल रबी की लाखों एकड़ फसल बेमौसम बरसात के कारण बर्बाद हो गई। मार्च महीने में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, हरियाणा और दिल्ली में घनघोर आंधी-तूफान और ओले पड़े। इससे गेंहू, जौ, सरसों, अलसी, अरहर, मटर, आलू और सब्जियों की लाखों एकड़ जमीन में लहलहातीं फसलें जमीन पर लोटने या पानी में डूब कर सड़ने लगीं। उत्तर प्रदेश सरकार ने जिलाधिकारियों को जायजा लेने और उसके मुताबिक किसानों को राहत देने की बात कही है। कुदरत किसानों पर आए दिन कहर ढाती रहती है। केंद्र और राज्य सरकारें तुरंत राहत देकर मरहम लगाने की कोशिश करती हैं। यह एक रिवाज की तरह आजादी के बाद से निभाया जा रहा है। इससे किसानों को फौरी तौर पर कुछ राहत तो मिल जाती है, लेकिन उनकी मूल समस्याएं जस की तस बनी रहती हैं। आजादी के बाद से अब तक केंद्र में कोई ऐसी सरकार नहीं आई, जिसने खेती-किसानी को सबसे कठिन और अनिश्चित धंधे से निकाल कर सरल और निश्चित आय का बनाने के लिए कोई ठोस कदम उठाया हो। केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियों में किसानों को लालीपॉप थमाने के अलावा कोई ठोस नीति या योजना नहीं रही। इसलिए समस्य...
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देश की सेवा का समय आ गया है , तैयार हैं न आप .... क्‍या बार्डर पर जाकर जंग लड़ना ही देश सेवा है या मानव द्वारा मानवता की सेवा असल देश सेवा है , इस बात का जवाब स्‍वयं से जरूर पूछियेगा क्‍येांकि कोविड-19 वैश्विक महामारी के बीच जब हमको देश के प्रति समाज के प्रति कुछ करने का मौका मिला है तो हम अपनी जिम्‍मेदारियेां से भाग रहे हैं , आज भी कई लोग बिना कारण घर से निकल रहे हैं , पार्क में घूम रहे हैं और अपनी मनमानी जिदंगी बसर कर रहे हैं। माना कि आपको अपनी जिदंगी से मोह नहीं लेकिन भारत में कोविड-19 कोराना का प्रभाव यदि 10 प्रतिशत लोगों को भी हुआ तो इन 10 प्रतिशत लोगों की मनमानी शेष 90 प्रतिशत लोगों पर भी भारी पड़ सकती है। ऐसे में सरकार की सारी कवायदें घरी रह जाएंगी , आज जब जरूरत है समाज व देश के लिए कुछ करने की तो क्‍या हमारी जिम्‍मेदारी नहीं है , कि हम जागरुक हो और आसपास के लोगों को भी इस भयावह बीमारी के बारे में जागरूक करें। भारत में यह भी देखने को मिला कि कोरोना प्रभावित लोग अभी भी पार्टियां कर रहे हैं , ताजा मामला मशहूर गायिका कनिका कपूर का है , जिनमें कोरोना वायरस पॉजीटिव...
हिंदी हैं हम वतन हैं..... मेरी मातृभाषा में कितनी ही कमियां क्‍यों न हों , मैं उससे उसी तरीके से चिपका रहूंगा जैसे बच्‍चा अपनी मां से। यही मुझे जीवनदायनी दूध दे सकती है। यदि अंग्रेजी वह स्‍थान हड़पना चाहे जिसकी वह हकदार नहीं , तो मैं उससे सख्‍त नफरत करूंगा -   महात्‍मा गांधी विविधता से भरे भारत जैसे देश में हिंदी के लिए भारत के राष्‍ट्रपिता महात्‍मागांधी के यह विचार भी आज भी प्रासंगिक हैं , हिंदी की उपयोगिता पर हमने उतना ध्‍यान नहीं दिया जितना देना चाहिए था , आज भी देखने में आता है कि अंग्रेजी माध्‍यम से शिक्षा लेने वाला विद्यार्थी ग‍ित का अंक   सिस्‍टी नाइन- फिफ्टीनाइन तो सहजता से बोल सकता है , लेकिन हिंदी में उसे उन्‍नह्तर और उनसठ बोलने में कठिनाई महसूस होती है , ऐसा क्‍यों है इस पर हमें विचार की जरूरत है। भाषा की सहजता के लिए सिर्फ सरकारों का मुंह तांका जाए यह पूरी तरह जायज नहीं है , संस्‍कार युक्‍त समाज के लिए हमारी भी यह नैतिक जिम्‍मेदारी है कि रोजगार व व्‍यक्तित्‍व विकास के लिए अंग्रेजी के साथ हम हिंदी को भी उतनी ही प्राथमिकता दें।    जब दे...