' अंतरराष्ट्रीय पुरूष दिवस विशेष ' मर्द को भी दर्द होता है , बस महसूस करने की जरूरत है... जीवन में हताशा और निराशा समान रूप से सभी को परेशान करती है , लेकिन महिला का दुःख अधिक और पुरुष का दुःख कम महसूस क्यों किया जाता है। ऐसा भेदभाव सामाजिक स्तर पर आखिर किसने पैदा किया और क्यों किया यह विचारणीय है। एक फिल्म का डायलॉग है मर्द को दर्द नहीं होता यह सामाजिक किंदवति बन गया है और समाज और सरकारें कभी उस पुरुष के दर्द को महसूस करने की जहमत नहीं उठाते हैं। लेकिन मैं आज अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस के मौके पर यह कहना चाहूंगा कि मर्द को दर्द होता है बस उसे महसूस करने की आवश्यकता है। चूंकि दिल मर्द का भी टूटता है बस उसे जोड़ने वाला दूसरा दिल तब तक नहीं मिल पाता जब तक मर्द अवसाद में न चला जाए जबकि महिलाओं के केस में दिल टूटने पर दिल जोड़ने वाले तैयार खड़े होते हैं। बीते कुछ सालों में पुरुषों में निराशा , अवसाद , अकेलापन की समस्याएं बढ़ी है और इनके पीछे होने वाली आत्महत्या भी बढ़ी हैं लेकिन यह पुरुष किसी भी विचार-विमर्श के केन्द्र में नहीं आ पाते। भगवान शिव ने भी अर्द्धनारीश्वर ...