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' अंतरराष्‍ट्रीय पुरूष दिवस विशेष '   मर्द को भी दर्द होता है , बस महसूस करने की जरूरत है... जीवन में हताशा और निराशा समान रूप से सभी को परेशान करती है , लेकिन महिला का दुःख अधिक और पुरुष का दुःख कम महसूस क्यों किया जाता है। ऐसा भेदभाव सामाजिक स्तर पर आखिर किसने पैदा किया और क्यों किया यह विचारणीय है। एक फिल्म का डायलॉग है मर्द को दर्द नहीं होता यह सामाजिक किंदवति बन गया है और समाज और सरकारें कभी उस पुरुष के दर्द को महसूस करने की जहमत नहीं उठाते हैं। लेकिन मैं आज अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस के मौके पर यह कहना चाहूंगा कि मर्द को दर्द होता है बस उसे महसूस करने की आवश्यकता है। चूंकि दिल मर्द का भी टूटता है बस उसे जोड़ने वाला दूसरा दिल तब तक नहीं मिल पाता जब तक मर्द अवसाद में न चला जाए जबकि  महिलाओं के केस में दिल टूटने पर दिल जोड़ने वाले तैयार खड़े होते हैं।   बीते कुछ सालों में पुरुषों में निराशा , अवसाद , अकेलापन की समस्याएं बढ़ी है और इनके पीछे होने वाली आत्महत्या भी बढ़ी हैं लेकिन यह पुरुष किसी भी विचार-विमर्श के केन्द्र में नहीं आ पाते। भगवान शिव ने भी अर्द्धनारीश्‍वर ...
  ईश्‍वर के पास हम कैसे जाएं। ईश्‍वर से हमें क्‍या-क्‍या मांगना चाहिए और उनसे क्‍या-क्‍या अपेक्षाएं करनी चाहिए। उससे हमें यही अपेक्षा करनी चाहिए कि हमारे संदेहों को सलामत रखे , क्‍योंकि संदेह ही प्रार्थना का एक रूप है। यह संदेह ही है जो हमारे विकास में हमारा मददगार है। यह हमें मजबूर करता है कि हम एक प्रश्‍न के कई जवाब तलाशें और तब तक तलाशें जब तक हमारी आत्‍मसंतुष्टि न हो सके। हम जो भी तलाशें उनमें से बेहतर की खोज कर अपने जीवन को तराशें।             ईश्‍वर हमारे फैसलों की रक्षा करें , क्‍योंकि निर्णय लेना भी प्रार्थना का एक हिस्‍सा है। हमें ईश्‍वर से यही प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें एक मार्ग से दूसरे रास्‍ते पर जाने और उसके चयन में सक्षम बनाए। ताकि हमारा हां सदैव हां में रहे और ना सदैव ना में रहे। ये न हो कि हम आज किसी निर्णय पर है और फिर उस निर्णय के द्धंद में जीवन को खपाते चले जाएं। एक बार जब हम अपनी राह चुन लें तो फिर पीछे मुड़कर न देखे। अपने निर्णयों पर अटल रहें न कि गलत निर्णय पर पश्‍चाताप की अग्नि में जलकर अपनी आत्‍मा को...