सिर्फ बड़ा आर्थिक सुधार ही उबार सकेगा कोरोना के बाद

सिर्फ बड़ा आर्थिक सुधार ही उबार सकेगा कोरोना के बाद

काेविड-19 सिर पर तानी हुई बंदूक जैसा है, जिसके डर से हमारा बटुवा खाली हो रहा है

चेतन भगत , अंग्रेजी के उपन्यासकार
इस लेख को लिखते समय भारत में लॉकडाउन है। सड़कें खाली हैं और ट्रेनें व फ्लाइट नहीं चल रही हैं। स्कूल, ऑफिस और फैक्टरियां बंद हैं। हम एक ऐसी वैश्विक महामारी से जूझ रहे हैं, जिसे हराना दुनिया के सबसे अमीर और विकसित देशों के लिए भी मुश्किल हो रहा है। यह लॉकडाउन सही है। तेजी से फैलने वाले कोविड-19 कोरोना वायरस को चीन ने इसी तरह के लॉकडाउन की मदद से ही रोका। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि यूरोप और अमेरिका के भी बड़े हिस्से में वायरस को फैलने से राेकने के लिए इसी तरह के कदम उठाए जा रहे हों। लोग डरे हुए हैं। इस समय भावनाओं पर भय हावी हो रहा है। हम वायरस को नहीं रोक सकते। हमारे पास अब तक इसके लिए वैक्सीन नहीं है। यह अपने आप धीमा हो जाएगा, गर्म मौसम इस पर कुछ हद तक रोक लगा सकता है, कुछ दवाएं इसमें काम आ सकती हैं, कोई वैक्सीन ईजाद कर सकता है पर हममें से कोई नहीं जानता कि यह कब और कैसे होगा। इतनी अनिश्चितताओं के सामने मनुष्य की सामान्य प्रतिक्रिया ताे डर के रूप में ही होगी। इस डर से निपटने के लिए हमें वह हर चीज करने की जरूरत है, जिसे हम कर सकते हैं। आखिर जीवन से अनमोल क्या है? कहावत है कि ‘जान बची तो लाखों पाए’। आज हमें जान बचाने के लिए लाखों, करोड़ों या अरबों चुकाने पड़ रहे हैं।
जब हमें डर संचालित करता है तो हम कीमत पर बात करना ही नहीं चाहते। एक सब्जी वाले से कोई व्यक्ति 10 रुपए के लिए भी सौदेबाजी करता है, लेकिन अगर उसी के सिर पर बंदूक लगी हो तो वह अपना पर्स खाली करने में देर नहीं लगाता। कोरोना हमारे साथ यही कर रहा है। वास्तव में यह भारत के सिर पर बंदूक तानकर उसका बटुवा खाली करवा रहा है। क्या यह इसके लायक है? यह सही सवाल नहीं है। जब तक बंदूक हमारे सिर पर है, हमें तो पालन करना ही होगा। चीन व कोरिया जैसे देश इस बंदूक को हटाने में सफल रहे हंै और इसलिए उम्मीद है कि हम भी ऐसा कर लेंगे। लेकिन, इस समय हमें इस बारे में सोचना चाहिए कि हम इस बटुवे को दोबारा कैसे भरेंगे? या फिर हम लॉकडाउन का बिल कैसे चुकाएंगे? क्योंकि, लॉकडाउन बटुवे कोे खाली करने जैसा है। यह अर्थव्यवस्था को रोक देता है। कुछ सेक्टर्स पर तो तत्काल ही तगड़ा असर हुआ है। इन उद्योगों में लगी कंपनियां लोगों को निकालेंगी। बहुत से लोग अपना ऋण नहीं चुका सकेंगे, जिससे बैंकों का एनपीए बढ़ेगा। इससे बैंक ऋण देने से डरेंगे और तब यह अन्य सभी क्षेत्रों को भी प्रभावित करेगा। अधिक कंपनियों काे नुकसान होगा, अधिक नौकरियां जाएंगी, मांग घटेगी और इससे बहुत बुरी मंदी आएगी। लाभ और राजस्व कम रहने से सरकारी टैक्स में कमी होगी और लक्ष्य पूरे नहीं हो सकेंगे। यह गंदा परिदृश्य है और यह गंदगी कब तक रहेगी, यह इस बात पर निर्भर है कि हमारे सिर पर कब तक बंदूक तनी रहती है। अगर लॉकडाउन के तीन हफ्तों के बाद चीजें सामान्य हो जाती हैं, तो हम इससे बाहर निकल सकते हैं। लेकिन, इसे खत्म होने में दो महीने से अधिक लगते हैं तो उसके बाद भारत को सालों तक संघर्ष करना होगा।
हम उम्मीद करते हैं कि ऐसा नहीं होगा। अमेरिका और यूरोप तो ऐसे लॉकडाउन को वहन कर सकते हैं, लेकिन भारत गरीब देश है, भारतीयों को इसके लिए तैयार रहना चाहिए। इस लॉकडाउन की एक कीमत होगी और हमें जानना चाहिए कि इससे कैसे निपटना है? हम इस बारे में क्या कर सकते हैं? एक पहले और अति आवश्यक कदम के तौर पर सबसे कमजोर और शटडाउन से सर्वाधिक लोगों को सीधी वित्तीय मदद दी जानी चाहिए। दिहाड़ी मजदूर, रेहड़ी वाले, टैक्सी ड्राइवर जैसे लोग जिनके जीवनयापन का साधन छिन गया है, वे सुरक्षित महसूस करें। दूसरा कदम, इंडस्ट्री की मदद की योजना के रूप में होना चाहिए ताकि इनमें कम से कम दिवालिया हों। कंपनियों को चिंता किए बिना तीन महीने में इससे उबरना होगा। यह आसान नहीं है पर हो सकता है। इस वजह से भारी महंगाई हो सकती है। सरकार पैसा छापती है पर किसी को तो इसे देना पड़ता है।
तीसरा और आखिरी, कदम कोविड-19 पर विजय के बाद का होगा। यह अर्थव्यवस्था को असल में खोलना होना चाहिए। बजट के बाद बजट और सरकार के बाद सरकार के बावजूद भारत में कोई बड़ा सुधार नहीं हो सका है। हो सकता है कि यह संकट हमें बड़े सुधार की ओर ले जाए, क्योंकि हमारे पास बहुत विकल्प नहीं हैं। हमने 1991 में ही बड़े सुधार किए थे, जब हम बहुत गहरे आर्थिक संकट में थे। 2020 का कोरोना वायरस भी बड़ा संकट है, जो हमें उन सुधारों की ओर ले जा सकता है, जिनकी हमें जरूरत हैं। और यह इस वायरस संकट से मिला एक लाभ हो सकता है।

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