चौतरफा आपदा और निपटने के तरीके
चौतरफा आपदा और निपटने के तरीके
पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और सामाजिक विषयों पर एक के बाद एक संकट सामने आए हैं। ये इतने व्यापक हैं कि विभिन्न देशों और समुदायों की प्रतिक्रिया देने की क्षमता कम पड़ सकती है।
अरुणाभ घोष
कोविड -19 की महामारी फैलने के पहले ही चालू वर्ष अनिश्चितता के साथ शुरू हुआ। ऑस्ट्रेलिया के वनों में लगी आग में 1,86,000 वर्ग किलोमीटर भूभाग जल चुका था। फरवरी में अंटार्कटिका का अधिकतम तापमान 18.3 डिग्री सेल्सियस हो गया जो जलवायु परिवर्तन में गिरावट का स्पष्ट संकेत है। जिंस कीमतों में गिरावट है, वैश्विक अर्थव्यवस्था में मांग की कमी बनी हुई है और तेल कीमतें भी काफी घट गई हैं।
अब हालात और खराब हुए हैं। कोरोनावायरस का प्रकोप बढऩे के साथ ही शहर, देश और क्षेत्र तक पूरी तरह बंद कर दिए गए। रूस ने तेल उत्पादन में कटौती करने से इनकार कर दिया है। इसके कारण सऊदी अरब ने बाजार में और अधिक तेल की भरमार कर दी और कीमतें लुढ़क गईं। सीमाएं बंद होने और आपूर्ति शृंखला बाधित होने, वस्तुओं और सेवाओं के बाधित होने से लोगों की स्थिति और खराब होने की आशंका है। आर्थिक प्रभाव नजर आने लगा है। डाऊ जोंस इंडस्ट्रियल एवरेज में 11 साल से चल रही तेजी गत सप्ताह समाप्त हो गई।
यह झटकों का एक तूफान सा है। पर्यावरण, आर्थिक और सामाजिक संकट का ऐसा सिलसिला जो राज्यों और समुदायों की प्रतिक्रिया देने की क्षमता को ही संकट में डाल सकता है। कोरोनावायरस ने आर्थिक संकट नहीं पैदा किया, बल्कि जो हालात पहले से खराब थे, इसने उनमें थोड़ा इजाफा किया। वर्ष 2008 में दुनिया का सामना वैश्विक वित्तीय संकट और खाद्य आपूर्ति संकट से एक साथ हुआ। वित्तीय संकट की वजह वित्तीय कुप्रबंधन और जोखिम के संकेतों पर ध्यान नहीं देना थी। खाद्य आपूर्ति संकट के लिए बढ़ती उर्वरक कीमत और ऊर्जा लागत, जैव ईंधन तैयार करने में अनाज का इस्तेमाल और प्रतिकूल मौसम आदि वजहें जवाबदेह थीं। प्रमुख चावल निर्यातक देशों ने निर्यात पर रोक लगा दी। खाद्य कीमतों के झटके ने पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका के कमजोर वित्तीय स्थिति वाले देशों को प्रभावित किया। अरब उभार के लिए आंशिक तौर पर यह भी एक वजह था। हम एक बार भी ऐसे ही संयुक्त संकट से गुजर रहे हैं।
जलवायु विज्ञान में वैज्ञानिक ऐसे बिंदुओं का उल्लेख करते हैं जहां जोखिम बहुत बढ़ जाता है। ये पृथ्वी के भौतिक जलवायु तंत्र में बदलाव से संबंधित हैं और हमारे पर्यावास से संबंधित हैं जिनके सीमा पार कर जाने पर हालात बद से बदतर हो सकते हैं। वैश्विक तापमान में वृद्धि हो सकती है, ध्रुवीय बर्फ के पिघलने का सिलसिला तेज हो सकता है और समुद्र का जल स्तर बढ़ सकता है। विश्व मौसम संस्थान का अनुमान है कि सन 2030 तक पृथ्वी का तापमान 1.65 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है।
कई अन्य कारक भी समस्या में इजाफा कर सकते हैं। पानी से जुड़ा तनाव सीमा पार तनाव को जन्म दे सकता है। बेमौसम की बारिश या खराब मॉनसून कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकता है, इससे ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोक्ता मांग में कमी आ सकती है। तेल कीमतों में गिरावट भारत और चीन जैसे बड़े आयातकों के लिए अस्थायी रूप से तेजी का सबब बन सकता है। सरकारों को तय करना होगा कि पेट्रोलियम उत्पादों पर शुल्क बढ़ाकर राजस्व में इजाफा करना है या कम कीमतों का लाभ उपभोक्ताओं को देकर मांग को बढ़ाना है। इस बीच मौसम की अतिरंजना लगातार बढ़ती चली गई। सन 1990 से 2018 के बीच भारत में ऐसी करीब 300 घटनाएं घटीं। इनमें भी अधिकांश घटनाएं वर्ष 2005 के बाद की हैं। सन 1980 के बाद से बाढ़ की घटनाएं तीन गुना बढ़ गई हैं।
हम पृथ्वी के साथ क्या करते हैं यह बात बहुत मायने रखती है और पृथ्वी हमारे साथ क्या करती है। परंतु असल बात यह है कि हम एक दूसरे के साथ क्या करते हैं। व्यापक जन स्वास्थ्य संकट इस बात की अंतदृष्टि प्रदान करता है कि दुनिया को समय-समय पर सामने आने वाले वित्तीय संकट को लेकर किस प्रकार की प्रतिक्रिया देनी चाहिए, व्यापारिक तनाव से कैसे निपटना चाहिए और जलवायु परिवर्तन के संकट से कैसे निपटना चाहिए।
पहला परिदृश्य: पूरी तरह बंदी। यह सबसे खराब नतीजा है। विभिन्न देश अपने आपको आंतरिक रूप से बंद कर सुरक्षित होने की कोशिश में हैं। वायरस का प्रसार रोकने के लिए यात्राओं पर रोक आवश्यक थी। परंतु सरकार विपरीत आर्थिक प्रभावों से कैसे निपटेगी? यूरोप की सरकारों के पास अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन देने की सीमित गुंजाइश है। अमेरिका ने कई ऐसे उपाय अपनाए हैं जिससे शेयर कीमतें कमजोर हुई हैं। चीन अर्थव्यवस्था को गति देना चाहता है लेकिन उसका निर्यात बाजार बंद है। समायोजित राजकोषीय प्रोत्साहन के अभाव में सरकारें व्यापार संरक्षण का रुख कर सकती हैं। इससे समस्या बढ़ेगी।
दूसरा परिदृश्य: आपातकालीन सेवाएं। यह समयबद्ध प्रतिक्रिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के निर्देशन के अधीन संसाधनों को ऐसे क्षेत्रों में एकत्रित किया जाता है जहां स्थानीय स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी हों। विभिन्न देश ज्यादा से ज्यादा सूचनाएं साझा करने को तैयार हो गए हैं ताकि गलत सूचनाओं का प्रसार रोका जा सके और जनता का भरोसा मजबूत हो। यदि सन 2020 के मध्य तक वायरस अपने चरम पर पहुंचता है तो सुधार की शुरुआत हो सकती है। परंतु दक्षिण एशिया में खराब मॉनसून या अमेरिका में कोई बड़ा तूफान आर्थिक सुधार को एक और झटका दे सकता है।
तीसरा परिदृश्य: सामुदायिक कदम। जहां खतरा ज्यादा हो वहां छोटे समूहों में बेहतर सहयोग हो सकता है। स्थानीय प्रतिक्रिया में सामाजिक तौर पर जवाबदेही भरा व्यवहार शामिल है। एक बार जोखिम की सीमा का उल्लंघन हो जाने के बाद सामुदायिक स्वास्थ्य व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। मौसम की अतिरंजना भी आशंकाओं को दोबारा जन्म देगी। भारत ने चक्रवातों की अग्रिम चेतावनी देकर और लोगों का जीवन बचाकर अच्छा काम किया है। परंतु केवल सामुदायिक कदमों से आपदा के बाद की स्थिति में सुधार नहीं किया जा सकता।
परिदृश्य 4: समेकित कदम। जी 20 देशों के वित्त मंत्रियों, पर्यावरण और स्वास्थ्य मंत्रियों की आपात बैठक के साथ प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं चार प्रतिज्ञाएं कर सकती हैं: (1) सार्वजनिक स्वास्थ्य संसाधन की पूलिंग (2) 18 महीनों के व्यापारिक प्रतिबंध पर और प्रतिबंध (3) समन्वित वित्तीय प्रोत्साहन अपनाने होंगे और छोटे कारोबारों की मदद से व्यय शक्ति बढ़ानी होगी (4) अमीर और गरीब देशों के सर्वाधिक संवेदनशील लोगों के लिए जलवायु जोखिम मानचित्र तैयार करने की प्रक्रिया।
मैं एकांत में बैठकर यह लिख रहा हूं। आपात परिस्थितियां हमेशा तार्किक प्रत्युत्तर नहीं पेश करतीं। कई बार ऐसे नतीजे सामने आते हैं जो कम उपयुक्त हों। हमें व्यक्तिगत, संस्थागत और सामुदायिक स्तर पर हल तलाशने होंगे। और आशा करनी चाहिए कि हमारे नेता अंतरराष्ट्रीय सहयोग को तवज्जो देंगे।
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