'अंतरराष्‍ट्रीय पुरूष दिवस विशेष
'  

मर्द को भी दर्द होता है, बस महसूस करने की जरूरत है...

जीवन में हताशा और निराशा समान रूप से सभी को परेशान करती है, लेकिन महिला का दुःख अधिक और पुरुष का दुःख कम महसूस क्यों किया जाता है। ऐसा भेदभाव सामाजिक स्तर पर आखिर किसने पैदा किया और क्यों किया यह विचारणीय है। एक फिल्म का डायलॉग है मर्द को दर्द नहीं होता यह सामाजिक किंदवति बन गया है और समाज और सरकारें कभी उस पुरुष के दर्द को महसूस करने की जहमत नहीं उठाते हैं। लेकिन मैं आज अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस के मौके पर यह कहना चाहूंगा कि मर्द को दर्द होता है बस उसे महसूस करने की आवश्यकता है। चूंकि दिल मर्द का भी टूटता है बस उसे जोड़ने वाला दूसरा दिल तब तक नहीं मिल पाता जब तक मर्द अवसाद में न चला जाए जबकि महिलाओं के केस में दिल टूटने पर दिल जोड़ने वाले तैयार खड़े होते हैं।  

बीते कुछ सालों में पुरुषों में निराशा, अवसाद, अकेलापन की समस्याएं बढ़ी है और इनके पीछे होने वाली आत्महत्या भी बढ़ी हैं लेकिन यह पुरुष किसी भी विचार-विमर्श के केन्द्र में नहीं आ पाते। भगवान शिव ने भी अर्द्धनारीश्‍वर के रूप में पुरुष व महिला को समान नजर से देखने का ही संदेश दिया लेकिन सामाजिक स्तर पर यह भेदभाव पुरुषों को परेशान करने वाला है। स्‍वास्‍थ्‍य आंकड़ें इस बात की गवाही देते हैं कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों में जीवन गंवाने की आशंका सबसे अधिक है। गत वर्ष द लैंसेट  रीजनल हेल्‍थ की रिपोर्ट यह गवाही देती है कि पुरुषों में आत्महत्या के मामलों में एक तिहाई से अधिक की वृद्धि हुई है। इन सबमें सबसे अधिक चिंताजनक स्थिति विवाहित पुरुषों की बताई गई है। बदलती जीवनशैली और आपाधापी और युवाओं में विवाह संबंधी उलझने जीवन पर भारी पड़ रही हैं। रोजगार पाने का सामाजिक व पारिवारिक स्तर का दबाव अभी भी महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों के कंधे पर ही अधिक है। 

    बिखरती जीवन शैली को थामने के मद्दे्नजर देश में महिला आयोग की तरह राष्ट्रीय पुरुष आयोग बनाने को लेकर बहस जारी है। लेकिन यह चिंताजनक है कि समाज में पुरुषों से संवाद को लेकर आज भी गंभीरता नहीं है। संवाद का माहौल नदारद है। स्वयं पुरुष मानसिक भावात्मक संवाद न होने के चलते अवसाद से ग्रसित हैं और कुंठित हैं। सीधे तौर पर देश में कोई ऐसा कानून भी नहीं है जिसे पुरूष अपने अधिकारों की रक्षा के लिए प्रयोग कर सकें। इंसाफ की तराजू पर पीडि़त पुरूष भी पीड़ा देने वाला नजर आता है, जबकि महिलाएं पीड़ा देकर भी बेचारी और लाचार नजर आती हैं। 

कामकाजी दुनिया में आज पुरुषों को सामाजिक, पारिवारिक स्तर पर भेदभाव से बचाकर उन्हें मानसिक, भावात्मक रूप से संबल देने का समय है। यह दिन पुरुषों की उपलब्धियां को गिनाने उन्हें दोहराने व उत्सव मनाने का दिन हैं। चूंकि मर्द को दर्द नहीं होता यह कसौटी पुरुष को तोलने की अब नहीं होनी चाहिए।  

Comments

  1. इसे पढ़ने के बाद, मुझे भी लगा कि यह एक जरूरी मामला है जिसे जमीनी स्तर पर पूर्ण ध्यान देने की आवश्यकता है। समाज, समुदायों और सरकारों को नए युग के आदमी के कई मामलों में सुधार के लिए उपाय करने की आवश्यकता है।
    Kudos! To you Akash Bhai, for writing so strongly about this matter.

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  2. बहुत सुंदर लेख
    यह पीड़ा हवा जैसी है जो महसूस होती है परंतु दिखती नहीं है

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    1. धन्‍यवाद भाई यह भी समय आएगा जब यह पीड़ा महसूस की जाएगी।

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  3. बहुत सुन्दर बंधुवर , साधुवाद

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  4. Bhut hi badiy likha hai bhaiya aapne ye dharna hi glt bna di h ki mard k dard nhi hota bilkul hota h hme smaj me mahilao k sath sath purush ki trf dhyan deni ki jrurt hai.

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  5. बहुत सुंदर लेख
    यह पीड़ा हवा जैसी है जो महसूस होती है परंतु दिखती नहीं है ,🙏👍

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    1. धन्‍यवाद सरकार लेख पर अपना प्‍यारा सा कमेंट देने के लिए

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